Contact: +91 844 894 1008
bgwebsite_logo
Bhagavad Gita
The Song of God

Bhagavad Gita: Chapter 18, Verse 74

सञ्जय उवाच |
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: |
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् || 74||

सञ्जयःउवाच-संजय ने कहा; इति–इस प्रकार; अहम्-मैं; वासुदेवस्य–श्रीकृष्ण का; पार्थस्य–तथा अर्जुन का; च-और; महा-आत्मनः:-उदार चित्त आत्मा का; संवादम्-वार्तालाप; इमम् यह; अश्रौषम्-सुना है; अद्भुतम्-अद्भुत; रोम-हर्षणम्-शरीर के रोंगटे खड़े करने वाला।

Translation

BG 18.74: संजय ने कहाः इस प्रकार से मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण और उदारचित्त पृथापुत्र अर्जुन के बीच अद्भुत संवाद सुना। यह इतना रोमांचकारी संदेश है कि इससे मेरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए हैं।

Commentary

इस प्रकार संजय भगवद्गीता के दिव्य उपदेश के अवसान की ओर आता है। वह अर्जुन को महात्मा कहकर संबोधित करता है क्योंकि उसने श्रीकृष्ण के उपदेशों और आज्ञाओं को ग्रहण किया। इसलिए वह श्रेष्ठ विद्वान बन गया। संजय अब अभिव्यक्त करता है कि उनके दिव्य संवादों को सुनकर वह इस प्रकार से अचंभित और स्तंभित हुआ जिससे उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये जो भाव भक्ति का एक लक्षण है। 

भक्तिरसामृतसिंधु में इस प्रकार से वर्णन किया गया है-

स्तम्भ स्वेदोऽथ रोमाञ्चः स्वरभेदोऽथ वेपथुः।

वैवर्ण्यमश्रुप्रलय इत्यष्टौ सात्त्विकाः स्मृताः।। 

"भाव भक्ति के आठ लक्षण हैं-जड़वत् हो जाना, पसीना निकलना, रोंगटे खड़े होना, वाणी अवरुद्ध होना कांपना, मुख का रंग पीला पड़ना, आँसू बहाना और मूर्च्छित होना।" संजय भक्तिपूर्ण मनोभावनाओं की इतनी गहन अनुभूति कर रहा है कि दिव्य आनन्द से उसके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि संजय के लिए युद्ध क्षेत्र में अत्यंत दूर हो रहे इस वार्तालाप को सुनना कैसे संभव हुआ? इसका वर्णन वह अगले श्लोक में करता है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
18. मोक्ष संन्यास योग

Quick Jump to Any Verse

Navigate directly to the wisdom you seek

Book with feather

Stay Connected!

Verse of the Day

Start your day with the timeless inspiring wisdom from the Holy Bhagavad Gita delivered straight to your email!

Thanks for subscribing to "Bhagavad Gita - Verse of the Day"!